गीतिका - मधु शुक्ला

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प्यार का अंतिम पहर जीवन रहा जिसका सखे,
प्राप्त करता वह नहीं यश नाम का मन का सखे।

व्यस्त जो संसार में निज लालसा के हेतु है,
वह नहीं संतोष पाया उम्र भर भटका सखे। 

जिंदगी उत्साह के बिन हो नहीं सकती सफल,
प्रेम से मनमीत के वह सर्वदा छलका सखे।

भावनाओं  में  अगर  संवेदना  बचती  नहीं,
साथ स्वजनों का जगत में दूर ही लुढ़का सखे।

चार जीवन के पहर बस व्यर्थ मत बर्बाद कर,
तू लगा भरपूर इसमें प्यार का तड़का सखे।
---   मधु शुक्ला, सतना, मध्यप्रदेश
 

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