हिंदी ग़ज़ल - जसवीर सिंह हलधर

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रूप की शीतल कला में चांद कब से ढल रहा है ।
और ऊपर आग का गोला युगों से जल रहा है ।

आदमी को भोगनी है सृष्टि की स्वाधीन गतियाँ ,
राह के प्रतिकूल फिर क्यों धूल मांथे मल रहा है ।

मौत से हारी अभी तक जिंदगी की मोह माया ,
रोज लालच में हमारा लक्ष्य हर दिन टल रहा है ।

क्या लिखूं इतिहास इसका जिंदगी क्षण भर कहानी ,
प्राण के सास्वत गमन में देह पल पल गल रहा है ।

बंधनों से मुक्त होते है नियम क्या भू-निलय के ,
राशि फल की आड़ में फिर वो हमें क्यों छल रहा है ।

है बहुत छोटी मगर यह जिंदगी वरदान मानो ,
लोभ का अभिशाप इसकी कोख में भी पल रहा है ।

सत्य सुंदर शिव जगत में शांति की लौ को जगाता ,
ज्ञान का आलेख "हलधर" नास्तिकों को खल रहा है ।
- जसवीर सिंह हलधर , देहरादून
 

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