तुझमें मैं ध्यानस्थ कबीरा - अनुराधा पाण्डेय

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है तुम्हारे प्रेम का उन्माद कितना?
क्या कहूँ री !
क्या कहूँ री! 
उस प्रथम दिन के मिलन पर, सप्तवर्णी व्योम का पट ।
औ तुम्हारा पास आ दो शब्द कहना धत्त री ! हट ।
दे रही यह रिक्तता अवसाद कितना?
क्या कहूँ री !
क्या कहूँ री !
कुछ विकलता तीव्र ऐसी, शब्द जिसको कह न सकते ।
बिन मिले प्रिय पात्र से पर,कोटि हो श्रम,रह न सकते ।
उठ रहा है मौन चित में नाद कितना ?
क्या कहूँ री ! 
क्या कहूँ री !
दृष्टिगोचर तुम नहीं पर ,कल्पना शुचि चित्र गढ़ती ।
शून्य में भी आँख मेरी बस तुम्हारे  नैन पढ़ती ।
रह गया पर अनकहा संवाद कितना ?
क्या कहूँ री !
क्या कहूँ री !
है तुम्हारे प्रेम का उन्माद कितना?
क्या कहूँ री !
क्या कहूँ री !
 - अनुराधा पाण्डेय द्वारिका , दिल्ली

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