गीत- (नववर्ष) - मधु शुक्ला

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आशाओं के दीप जलाकर, वर्ष  नया ले आया है।
उम्मीदों को मिला उजाला, सारा जग हर्षाया है।

मजहब, भाषा की भीतों में, कैद नहीं खुशियाँ होतीं।
परिवारों की यह परिपाटी, क्षमा सभी त्रुटियाँ होतीं।
भेद रहित हम भारतियों ने, अपना देश बनाया है..... ।
आशाओं के दीप जलाकर,,,,,,,,,
संस्कृतियों का सागर भारत, शरण सभी को यहाँ मिले।
ईद,दिवाली,क्रिसमस से मिल,ज्योति पर्व का पुष्प खिले।
हर उत्सव में आगे बढ़कर, हमने ढ़ोल बजाया है..... ।
आशाओं के दीप जलाकर,,,,,,,,,
एक जनवरी तेइस ने नव, भावों का संचार किया।
मानवता के पुर्नगठन पर, नव चिंतन संसार किया।
मेल जोल की उम्मीदों को, नूतन वर्ष जगाया है........ ।
आशाओं के दीप जलाकर,,,,,,,,,
--- मधु शुक्ला, सतना, मध्यप्रदेश
 

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