एक कप चाय (लघुकथा) = डा.अंजु लता सिंह 

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रोज की तरह ही कॉलोनी के पार्क में प्रातः भ्रमण करते हुए अरोरा जी गत वर्ष ही तलाक देने वाली नौकरीपेशा सुदर्शना पड़ोसन को योगा करते हुए ,अपने पालतू डॉगी व्हिस्की के साथ खेलते हुए और मशीनों पर एक्सरसाइज करते हुए बहुत ध्यान से देखा करते थे। आज हिम्मत करके बेटी की उम्र की उस युवती से बातें करने का मन बना ही बैठे थे।
तेज-तेज कदम बढ़ाती हुई मधुरिमा से वे बोले-
- नमस्ते मधुरिमा जी! कैसी हैं आप?
- गुड मॉर्निंग अरोरा जी! मुझे क्या हुआ ? भली चंगी हूं.
- ही ही ही.. बड़ी नॉटी हैं आप..आपका डॉगी तो बड़ा क्यूट है जी!
- हां जी! आजकल जानवर इंसान से ज्यादा प्यारे होने लगे हैं।
- मैं आपकी हालत समझता हूं। घर में अकेले मन भी नहीं लगता होगा आपका। दोनों बच्चे भी बाहर ही हैं न? कभी कोई जरूरत पड़े , तो जरूर बताना मुझे।
- मेरी चिंता छोड़िये... उधर देखिये मिसेज अरोरा बुला रही हैं आपको.
- चाय पीने के लिए आऊंगा आपके घर एक दिन.. रोज ही सोचता हूं. 
- चाय नहीं पीती मैं ..
मिसेज अरोरा अब उन दोनों के काफी करीब पहुंच चुकी थीं। घर की ओर मुड़ते समय वे बोलीं-
- मधु बेटा! आओ कभी हमारे घर..आपको अपने बगीचे के फल खिलाएंगे। 
चाय तो हम पीते नहीं हैं  दोनों।
खींसे निपोरते हुए अपना सा मुंह लेकर अरोरा जी झट से अपने घर के अंदर प्रविष्ट हो गए।
 -डा.अंजु लता सिंह, नई दिल्ली

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