एक खत – रीतू गुलाटी

pic

सोचती हूँ सरताज एक खत लिखूँ।
हाले बयान अपना ही आज लिखूँ।

बहार बनकर जीवन में आये।
नियामते खुदा कसम तुम लाये।

प्यार बरसा इतना मुझ पर तेरा।
खुदा कसम ऐसा सोचा न हेरा।

रीता था प्रेम का जो कलश भरा।
प्रेम की रूबाईयाँ से घट था भरा।

खिल गयी थी जिंदगानी अब मेरी।
प्यार की कशिश ही बाकी थी तेरी।

मर जाऊँगी इन बाँहो मे,सपना पालती।
दूर कभी होना नही,मुझसे,दुआ माँगती।

खुदा का नूर बरसे हम संग संग रहे।
प्यार की दुनिया मेरी, तेरे संग आबाद रहे।।
- रीतू गुलाटी.. ऋतंभरा,
 

Share this story