मर्द तो मर्द होता है --डॉ.अर्चना पांडेय

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विद्यालय में हमारे बगल में बैठने वाले जॉयदीप सर मिजाज से बहुत ही मजाकिया इंसान है। हर बात में कोई न कोई मजाक ढूंढ लेना, उनकी अद्भुत कला है। उनके आस-पास रहने वाला इंसान बिना हँसे रह ही नहीं सकता। अगर इनके जैसा मनुष्य हर घर में हो तो किसी को भी कोई बीमारी हो ही नहीं सकती क्योंकि इनकी बातों में इतना दम होता है कि इंसान दिल खोलकर हा-हा-हा.....हँसने के लिए बाध्य हो जाता है। हँसी हमारे जीवन की औषधि है। दिल खोलकर हँसने वाला इंसान हर बला से बिल्कुल बच जाता है। इस तरह से जॉयदीप सर हँसा-हँसा कर लोगों की टेंशन कम कर देते है। जो एक बहुत बड़ी सेवा है। खुश रहकर खुशियाँ बाँटना उनकी आदत है, जीवन का लक्ष्य है।
जॉयदीप सर लोगों मिलते- जुलते एक कॉमन सवाल पूछा करते है। और जिस अंदाज़ में पूछते है शायद ही कोई व्यक्ति हो जो हँसे बिना रह पाए। सवाल है- दो व्यक्ति आपस में लड़ते हैं।
पहला व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को एक थप्पड़ मरता है।
अब इसके रिप्लाई में दूसरा व्यक्ति, पहले व्यक्ति को दो थप्पड़ मारता है।
अब बताइए, दोनों में ज़्यादा शक्तिशाली कौन है?
उनका जीने का अंदाज़ ही अलग है। बड़ी से बड़ी समस्याओं को चुटकी बजाकर उनका समाधान निकाल लेते है। 
कुछ दिन पहले की ही बात है। उनका टिफिन बंदर लेकर भाग गया। हमारे विद्यालय में बंदर विचरते रहते हैं। जिससे बच्चे तो बच्चे शिक्षकों का भी अच्छा मनोरंजन हो जाता है। टिफिन तो बंदर लेकर भाग गया, अब वे चिंतित हो गए क्या खाऊँगा? मैंने कहा- कोई नहीं आज मेंरे टिफिन से काम चला लिजिए। खाने की चीज है किसी के पेट में तो गया, आखिर बंदरों को भी जीने का हक है। उनका पेट भी भरना ज़रूरी है। तभी तो सृष्टि में बैलेंस बना रहेगा और कोरोना जैसी भयावह महामारी नहीं आएगी। सृष्टि पर हर जीव का रहना जरूरी है। उनको भोजन देना भी हमारी जिम्मेदारी है। 
उस रात को जॉयदीप सर न ही मच्छरदानी लगाए और न ही ऑलआउट जिससे मच्छर भी जीवित रहें और हमारी सृष्टि बची रहे। इस तरह के व्यक्ति है हमारे जॉयदीप सर।
अपने विद्यालय के दिनों से ही एक लड़की उनके आकर्षण का केंद्र रही। वह दो चोटी वाली दुबली-पतली, गोरे रंग वाली मासूम सी लड़की, क्लास में सबसे अलग थी। और वही लड़की हमारे जॉयदीप सर को पसंद थी। वह पसंद कब चाहत में बदल गया, पता ही नहीं चला। जॉयदीप सर उस लड़की को दिलो-जान से चाहने लगे थे। पर वह दूध सी लडक़ी जिसका नाम श्वेता था जब उसको पता चला तो उसके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। अब सारे बच्चे उसे खास नज़र से देखने लगे थे।
आखिर अब वह जॉयदीप जैसे भले बच्चे का प्यार बन गई थी।
जॉयदीप सचमुच एक भला बच्चा था। थोड़ा नटखट ज़रूर था लेकिन वह एक नेक विद्यार्थी थी। अधिकतर शिक्षक उसे पसंद करते थे। 
जॉयदीप अपने भविष्य के बारे में सोचकर अक्सर डर जाया करता था। फिर मन-मन में कहता: जॉयदीप तू तो मर्द है। और मर्द नहीं डरता है। 
जैसा कि जॉयदीप नटखट बालक था, वह कई बार दूसरे की बैग से टिफिन निकाल कर अलग-अलग भोजन का आनंद उठाता था। वह टिफिन निकालने वाला काम श्वेता के बैग से ज़्यादा करता था। अब तो जॉयदीप भोजन के स्वाद बताने का मास्टर बन गया। और यह ट्रेंड इतना चला कि उसके क्लास के अधिकतर बच्चे उससे अपना भोजन चखवाने लगे। यह बड़ा ही अद्भुत था। जॉयदीप का पेट दूसरे की टिफिन से ही भर जाता था।
समय का काम है चलते रहना। देखते-देखते दोनों कक्षा बारहवीं में पहुँच गए। 
अब जॉयदीप जितना श्वेता को चाहता था उतना ही श्वेता जॉयदीप को। दोनों की प्रेम की गाड़ी निकल पड़ी थी। 
अब दोनों के पास पर्सनल मोबाइल हो चुकी थीं। मोबाइल में व्हाट्सएप भी आ गया था। देर रात पढ़ाई खत्म होने पर दोनों चैटिंग भी कर लिया करते थे। अब दोनों मास्टर्स कर रहे थे। प्रेम और प्रगाढ़ होता जा रहा था। श्वेता निश्चिंत थी। एक नेक लड़का उसको पसंद करता था। 
दोनों अपने जीवन के वसंत काल का आनंद ले रहे थे। 
अब तो मास्टर्स के फाइनल एग्जाम भी खत्म हो गया। दोनों ने खूब मेहनत की। ताकि दोनों का जीवन सुनहरा हो। अब परीक्षा खत्म हो गई थी। मौज -मस्ती करने की बारी आई।
असम के विख्यात तिलिंगा मंदिर के दर्शन भी दोनों ने साथ में किया। अब बारी थी दोनों को अपने- आपने गार्जियन से अपने रिश्ते के बारे में बताने की। दोनों साहस जुटाकर भी नहीं बोल पा रहे थे। हर दिन सोचते आज बता देंगे। लेकिन वह आज नहीं आ रहा था। एक दिन दोनों असम की विख्यात डिगबोई नामक छोटे से टॉउन को देखने चले। दोनों ने प्लान किया कि वे पहले पार्क विजिट करेंगे और फिर डिगबोई की फेमस ऑइल रिफाइनरी देखने जाएंगे।
जॉयदीप और श्वेता डिगबोई की यात्रा के लिए निकल पड़े थे। रास्ते में असम की मनोरम प्राकृतिक दृश्य दोनों के मन मोह रहे थे। सचमुच जीवन में अपने पसंदीदा व्यक्ति का होना कितना खास होता है। हर समय जैसे होली- दिवाली हो।
सुबह के ठीक दस बजे दोनों पार्क के गेट पर पहुँच चुके थे। भीतर बहुत उत्सुकता से प्रवेश किए। अचानक जॉयदीप चौक गया! ऐसा लगा जैसे उसकी पिता जी की आवाज़ पीछे से आ रही हो। जब पीछे मुड़कर देखा तो, उसके पिता जी फोन में बात कर रहे थे। जॉयदीप का चेहरा पूरा लाल हो गया, कान गर्म हो गए तथा अब वह छुपने की जगह ढूंढ़ने लगा।
लेकिन! श्वेता क्या सोचेगी?
जिस पिता के घर में मुझे बहु बनाकर ले जाओगे, उन्ही से, सब कुछ छुपा रहे हो। नहीं, नहीं, मैं श्वेता के साथ यह अन्याय नहीं कर सकता। आखिर मैं एक मर्द हूँ। मैं अपने पिता को आज खुलकर सब बता दूँगा। 
नहीं तो श्वेता जो मेरे ऊपर इतना भरोसा करती है, उसके नज़रों में मैं फिर कैसे उठ पाऊँगा!
जॉयदीप लंबी श्वास भरकर, हिम्मत बांधकर अपने पिता के सामने जा पहुँचा। बुदबुदाते हुए...
आखिर मैं मर्द हूँ.....
पिता जी: जॉयदीप।
जॉयदीप: जी पिता जी।
पिता जी: पार्क घूमने आए हो, बताया तक नहीं। तुम्हारी बहन का परीक्षा है। साथ ले आते।
जॉयदीप: जी-जी -जी - जी.....
पिता जी: वैसे तुम अकेले तो आये नहीं होंगे। किसके साथ आए हो।
जॉयदीप: (श्वेता जो बगल में खड़ी थी, उसके तरफ इशारा करते हुए) ये- ये श्वेता, मेरी फ्रेंड।
पिता जी: (गम्भीरता से सर हिलाते हुए और श्वेता को ध्यान से देखते हुए) अच्छा जी। तो ये बात है!
इतनी बात होने पर जॉयदीप के पिता जी उसकी बहन को लेने परीक्षा केंद्र के लिए निकल गए।
अब श्वेता मन ही मन बहुत खुश थी। सचमुच जॉयदीप लाजवाब है।
अब रात के दृश्य के बारे में सोचकर जॉयदीप सहम रहा था। जब सभी खाने के टेबल पर साथ होंगे तो फिर क्या होगा! लेकिन जॉयदीप टेलेंट का भंडार था। उसको यह बहुत अच्छे पता था कि अपने पैरेंट्स तथा जीवन साथी के साथ कैसे ताल- मेल बनाना है।
रात को दस बजे जब जॉयदीप अपने माता- पिता तथा बहन के साथ खाने के टेबल पर बैठा तो सचमुच स्थिति बहुत सीरियस थी। लेकिन जॉयदीप का जादुई व्यवहार ने सबको समझा लिया। 
पापा अब तो मेरा मास्टर्स भी हो गया है। तथा मैं आपके बिजनेस को भी बहुत अच्छे से संभाल रहा हूँ। 
सभी ने सुंदर रिश्ते के लिए मौन सहमति दिया।
जॉयदीप बुदबुदाया- (अपने शर्ट के कॉलर को ऊपर उठाते हुए तथा बहन की ओर देखते हुए) आखिर मैं एक मर्द हूँ। 
-डॉ.अर्चना पांडेय अर्चि, डिब्रूगढ़, असम

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