आशिकी - अनिरुद्ध कुमार

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रहना सदा बिंदास सा, नाकार की है आशिकी।
अच्छा नहीं मारे फिरो, ना प्यार की है आशिकी।।
                         
अक्सर लगे बेचैन सा, नाकाम सी वो जिंदगी।
हरदम रुलाये याद में, बेकार की है आशिकी।
                        
जो खोगया इस भीड़ में, दुनिया हुई उसकी जवां,
कैसै बताये क्या हुआ, लाचार की है आशिकी।
                          
टूटे जिगर आँसू बहे, हरदम लगे कितना दुखी,
राहें निहारें हर घड़ी, दीवार की है आशिकी।
                         
जो भी किया मारा गया, ताउम्र सदा रोता रहा,
हालात ने लूटा उसे, अंगार की है आशिकी।
                           
सोंचा नहीं हालात ये, दिन भी दिखायेगी कभी,
जीना लगे दुश्वार बस, बेजार की है आशिकी।
                            
मुमकिन नहीं 'अनि' भूलना, यादें सताती है सदा।
जानो सितम ढ़ाये सदा, गमखार की है आशिकी।
- अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड

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