अल्फाज मेरे = सुनीता मिश्रा

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माना अल्फाज है मेरे गुलाम...
जिधर चाहूँ उधर मोड़ दूँ...
कभी सपनों में छोड़ दूं ...
कभी अपनों में मोड़ दूं ...
अल्फाजों के संग ...
जब चाहूं खेल दूं ...
इंसानी फितरत से ये अल्फाज ...
गर रूठे तो ...
मेरी कलम भी रो पड़े ...
अल्फाज आज मेरे हैं अनशन पर ...
चाहती हूं जिधर ...
जाते नहीं वो...
जाने क्यों बातें मेरी ...
मानते नहीं वो...
ना सपनों में जाते हैं ...
ना अपनों में खोते हैं...
मेरी ही जज्बातों से...
मेरी ही कलम से ..
लड़ बैठे है वो...
जज्बातों को... 
अल्फाजों को...
रूप देते नही वो...
अब बता?...
कविता - गज़ल मेरी...
कैसे पूरी हो ?...
✍️सुनीता मिश्रा, जमशेदपुर

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