बहारों से सजा देते - अनिरुद्ध कुमार 

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यहाँ पे जी नहीं लगता, जियें कैसे बता देते,
लगे दुनिया पराई सी, चले आते जिला देते। 
                        
कहाँ कोई लगे अपना, अजूबा सा लगे सपना,
मुहब्बत हीं भरोसे का, कयामत तक निभा देते। 
                         
लगे रूठा, जमाना अब, हवायें भी यहाँ बागी,
तन्हाई में कहाँ लज्जत, खुशी दिल में जगा देते। 
                           
कहीं रुसवा न हो जाये, जिगर में डर समाया है,
अँधेरा क्या उजाला क्या, शमा की लौ जला देते। 
                         
खुशी या गम गुजारे सँग, गवारा है सदा हमदम,
गिले शिकवे जमाने की, अदब से आ मिटा देते। 
                         
शिकायत क्या हमें तुमसे, तुम्हारा गम हमारा गम,
कसक उठती कलेजे में, जलन आके बुझा देते।
                           
खता किसकी नहीं सोंचे, हुआ जो भी वहीं छोड़ो,
खुशी से झूम जाये 'अनि', बहारें मिल दुआ देते।

- अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड

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