वश नहीं हृदय दाह पर - अनुराधा पाण्डेय 

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साँस ही रुक गई प्राण रूठा रहा।
रात यूँ ही कटी मात्र मनुहार में।

एक क्षण में लगा कल्प वनवास-सा ।
भग्न उर में उठा एक उछवास-सा ।
बोल तेरे लगे शुष्क जब भी शुभे !
अर्थ ही खो गया आज संसार में। 
रात यूँ ही कटी मात्र मनुहार में।

यूँ  लगे आ गया एक क्षण में प्रलय ।
खोजता रह गया चिर निलय हत प्रणय ।
हो गई क्षण विमुख पग विपथ जब हुए,
सार ही यूँ लगा मर गया प्यार में। 
रात यूँ ही कटी मात्र मनुहार में।

मौन तेरा निमिष भी व्यथा घोर है ।
चिर प्रणय से बंधा दो हृदय छोर है ।
मन वहीं है सतत अश्रु रुकते नहीँ...
हार जिसको गया वो, न अधिकार में। 
रात यूँ ही कटी मात्र मनुहार में।
- अनुराधा पाण्डेय (अनु) , द्वारिका , दिल्ली
 

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