विभिन्न काव्यिक अलंकारों का छंद बद्ध परिचय - अनुराधा पाण्डेय 

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शब्द-अर्थ के दो माणिक से, धन्य काव्य संसार ।
अलंकार करते कविता का, दोनो से श्रृंगार ।।

उद्दीपित कविता का यौवन,करने हित मधुमास ।
शब्द-शब्द कंचन भर जाते ,श्लेष यमक अनुप्रास ।।

अलंकार मणि शब्द रचित हैं, कविता में ये तीन ।
काव्य बिना इन हेम राशि के, होते अतिशय दीन ।।

अर्थ जनित भी अलंकार के , भेद यहाँ हैं पाँच ।
एक-एक कर जिनको लेंगे, अभी छंद में बाँच ।।

उपमा रूपक उत्प्रेक्षा औ, अतिशयोक्ति ये चार ।
और मानवीकरण नाम है, पंचम भेद प्रकार ।।

अलंकार के प्रकट भेद प्रिय ! अतः हुए ये आठ ।
आओ ! करते एक-एक का, क्रम से छांदस पाठ ।।

प्रथम श्लेष की घटा उमड़ती, हरती अवनी पीर ।
विरह कलित हो जाता चलता, राग रहित जब तीर ।।

"यमक" नदी के तीर खड़े हो, मार गया कटु तीर ।
क्रोची खग को खेल - खेल में, दिया निठुर ने पीर ।।

अंजन अँखियों से अनुगत कर, लिखा छंद अनुप्रास। 
मग्न मना मनसिस ने मसि से, उपजाया मधुमास ।।

अर्थ जनित अब अलंकार पर , डाले क्रमिक प्रकाश ।
जिनने कविता के कानन का, किए अमर विन्यास ।।

उपमा चितवन की देनी क्या ,गौण सभी उपमान ?
अधिक चाँद भास्वर से लगती, तुम प्रियवर ! द्युतिमान।।

ओढे चंदा की चादर-सी, चितवन तेरी हेम ।
रूपक हो साकार योग सी, अनुप्राणित हो क्षेम ।।

उत्प्रेक्षा है रंच न इसमे , मूर्त कनक तुम सत्व ।
जग के हर लावण्य गठन में, एक तुम्ही हो तत्व ।।

अतिशयोक्ति जग को लगता जब, कहूँ तुम्हें मैं नित्य ।
अमर तुम्हारा तन है प्रियवर !,जब तक शशि आदित्य ।।

नद की धारा री ! तुम पढती, किस कवि उर के गीत ।
अरी मानवी ! कहो संजोती , किस मानव की प्रीत ।।
- अनुराधा पाण्डेय , द्वारिका, दिल्ली
 

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