बैसवारी दोहे = कर्नल प्रवीण त्रिपाठी

बैसवारी दोहे = कर्नल प्रवीण त्रिपाठी

सरदी के दिन भागि गे, उतरा नाहिं खुमार।

फागुन कसिके तपि रहा, गरमी खड़ी दुआर।।1

रोज बवंडर उठि रहैं, चउगिर्दा है धूल।

ताप बढ़ा कुम्हला रहैं, रितु बसंत कै फूल।।2

द्याखें पुनि-पुनि लोग नभ, बादर दिखैं न एकु।

राहत चैन न मिलि रहा, करिकै जतनु  अनेकु।।3

हाँफैं हरहा धूप मा, सबै चिरइ बेहाल।

चैन न आवै छाँह मा, झुलसे पर अरु खाल।4

कीरतिमान बना रही, गरमी पड़े प्रचंड।

त्वाड़त मौसम आजु कल, सबहिन केर घमंड।।5

उन्नति का लइ नामु सब, कीन्हे'नि सत्यानास।

दुहि डारेनि सब संपदा, ब्याढ़ै जाय बिकास।6

अति गरमी सरदी करै, जँह-तँह आवै बाढ़।

बेमानी भइ आजुकलि, सबकै अक्किल दाढ़।।7

कर्नल प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा/उन्नाव, 01/4/21

कसिके- पूरी ताकत से

हरहा- पशु धन

 पर- पंख

त्वाड़त- तोड़ती/तोड़ता

दुहि- दोहन

ब्याढ़ै जाय-  भाड़ में जाये

अक्किल दाढ़- अक्ल दाढ़

= कर्नल प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा/उन्नाव,

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