पंछी की वेदना - कर्नल प्रवीण त्रिपाठी

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नीड़ बिन पंछी अकेला रह सकेगा अब कहाँ।
शाख़ सूखी पर्ण बिन होगा बसेरा अब कहाँ।1

साथ रहने में परम सुख काटता एकांत है,
सोच में गुम एक प्राणी है दिलासा अब कहाँ।2

ताकता नभ व्यर्थ में चिंतन मनन क्या कर रहा,
कंठ है अवरुद्ध स्वर मुख से निकलता अब कहाँ।3

दृश्य अपलक देख यह मन में उठे कुछ वेदना,
मानवी आघात से उपवन बचेगा अब कहाँ।4

पीर खग की हम सुनें महसूस कर लें दर्द को,
आज है अवसर मदद का फिर मिलेगा अब कहाँ।5
- कर्नल प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा/उन्नाव
 

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