शीश झुकाना - अनिरुद्ध कुमार

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कौन यहाँ बोलो है अपना,
सारा जग लगता है सपना।
व्याकुलता मन को झकझोरे,
जागे सोये सुख-दुख जपना।
                
जीवन जी लो अपना-अपना,
चिंतित मानव सीखा तपना।
भटक रहा मन सुधबुध हारे,
चिंतन हीं दुनिया का गहना।
               
झूल रहा मन कोना-कोना,
हरपल सोंचे  पाना खोना।
बाँध गठरियाँ हरपल तौले,
पागल मन लागे मस्ताना।
                
जान रहा इक दिन है जाना,
फिर भी काम करे मनमाना।
लोभी मन रुक-रुक उलझाये,
इधर उधर भटके दीवाना।
               
धन वैभव का कौन ठिकाना,
आना जाना बस पछताना।
तरसत अँखियाँ छाती पीटे,
रोना गाना घर को जाना।
                
हे मानव नाहक सुर ताना,
मालिक देखें क्या घबड़ाना।
मन का सुगना रह-रह बोले,
हरि चरण में शीश झुकाना।

-अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड।
 

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