बचपन = ज्योत्स्ना रतूड़ी

बचपन = ज्योत्स्ना रतूड़ी

बचपन होता है बहुत प्यारा बहुत निर्मल, 
झूठ से कोसों दूर नहीं जानता कोई छल,
होता है बचपन   दिखावे से  बहुत  दूर, 
स्वभाव से  होता  नटखट  थोड़ा  चंचल।

सुनहरी होती है बचपन की   यादें,
न चिंता जिम्मेदारी न कसमे न वादे,
खेलना  कूदना  वो  गप्पे  लड़ाना,
न  मन में  संकल्प न  कोई   इरादे।

समझता है बचपन सबको अपना ही,
दूर के रिश्ते का भी लगता है सगा ही,
न कोई तेरा न मेरा न  अपना न पराया,
देता जो कोई प्यार ढल जाता उधर ही।

बचपन में न प्रोजेक्ट न कोई फाइल बनाई,
खेलते थे  भाई बहन राजा वजीर चोर सिपाई,
दोस्तों के साथ खेलते थे पीटठा गरम आइस पाइस, 
हो जाती थी दोस्तों से छोटी-छोटी बातों पर लड़ाई ।

वो  दोस्तों का  आपस  में   लड़ना   झगड़ना, 
अप्पा  है  कभी तो   कभी    कुट्टी   हो   जाना,
गली में खेलना क्रिकेट वो खो -खो वो धप्पा,
करके कोई जिद तो अपनी   बालहठ  मनवाना ।

सोते   समय   दादी   से  सुननी   वो   कहानी,
 होते   हैं  पाठ तो   सारे   याद   होते  जुबानी
 होता बचपन  खोजी   तो जिज्ञासु   भी   होता
 बस्ता होता कंधे पर माँ को पहले बात बतानी ।
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ज्योत्स्ना रतूड़ी ज्योति, उत्तरकाशी , उत्तराखण्ड
 

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