लौट के आओ अपने गांव = ममता जोशी

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याद करती पुरखों की छांव,
सूने पड़ गये खेत खलियान। 
आस लगाकर तुम्हें देखते ,
कहां खो गई है इसकी शान।।
पल-पल तुम्हारी राह ताकते,
कहां खो गये यहां के वासी।
तुम्हारी याद में रोता गांव ,
अब तो लौट के आ प्रवासी,
याद करती पुरखों की छांव,,
खेत, खलियान रूठ गये हैं,
याद तुम्हें ओ करते है।
पनघट पर भी चहल नहीं है , 
जब कोई नजर नहीं आता है ।।
बाग बगीचे तुम्हें पुकारे ,
भूल गए तुम अपनों की छांव।
सूने पड़ गये गांव गोढ़हार ,
लौट के आ जाओ अपने गांव 
जिन पेड़ो पर मस्ती करते ,
संदेश तुम्हें ओ देते है ।
चाहे हमको काट भी लो तुम,
पर याद तुम्हारी आती है ।।
बुजुर्ग बैठे आस लगाकर,
बेटा घर को आयेगा ।
पहले जैसी खुशी गांव में,
इक दिन फिर लौटायेगा ।।
स्नेहा हर क्षण देती संदेश,
लौट आना तुम अपने देश 
उन्नति पथ पर बढ़ते जाना 
गांव मगर कभी न बिसराना 
= ममता जोशी पैन्यूली 
सुजड़ गांव, प्रताप नगर(उत्तराखंड)

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