दोहे = स्वर्ण लता 

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तड़पत तेरी याद में,नैनन बरसत नीर।
पगली जैसी डोलती,मन है अधिक अधीर।।

रो रो साजन नैन से,सूख गया है नीर।
कोयल कर्कश बोलती, तीखी लागे कीर।।

दिन बीते ना बीतता, नैनन सूखा नीर।
साजन तेरी याद में, भीगा मेरा चीर।।

साजन तेरी याद में, नैनन बरसत मेह।
तड़पत मोरा जियरवा,अरु जलती है देह।।

नैनन बरखा नीर की, सूख गई है देह।
कैसे भीगे मोर मन,जब बरसत है मेह।।
= स्वर्ण लता सोन,  दिल्ली
 

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