दोहे - मधु शुक्ला

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देवा गणपति आप सा, कोई नहीं सुजान।
माँगे जो हर ब्याहता, माँग रही वरदान।।

माँ गौरी सुनिए विनय, आई दासी द्वार ।
माँग रही वरदान खुश, रहे पिया, परिवार।।

करवा देवी आपसे, माँग रही वरदान।
दमके टीका लालिमा, घटे न इसकी शान ।।

माँग रही वरदान शशि, रखना अमर सुहाग।
दिन प्रतिदिन बढ़ता रहे, प्रियतम का अनुराग।।

चाँद चाँदनी जिस तरह, थामे रहते हाथ।
माँग रही वरदान प्रभु , आजीवन पिय साथ।।
मधु शुक्ला . सतना , मध्यप्रदेश 
 

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