दादी अम्मा =अर्चना गोयल माही

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मेरी दादी अम्मा अब तो लाठी लेकर चलती है,
फिर भी अब तक घर में तो उनकी ही चलती है। 
मुर्गे की बांग व चिड़ियों के संग जग जाती है,
सूरज के आने से पहले ही वह उठ जाती है।

फिर हम सबको प्यार से आ कर के जगाती हैं,
और उनकी दिनचर्या की चाकी यूं अविरल ही,
अपना फर्ज निभाते शाम ढले तक चलती है।
मेरी दादी अम्मा अब तो लाठी लेकर चलती है,
फिर भी अब तक घर में तो उनकी ही चलती है।

नहा धो कर सुबह सवेरे दादी मंदिर को जाती है,
तुलसी को जल अर्पण कर फेरी सात लगाती है।
घंटी के साथ शंखनाद कर वो धूप-दीप जलाती है,
घर में  खुशी की लहर उनके दम से ही चलती है।
मेरी दादी अम्मा अब तो लाठी लेकर चलती है,
फिर भी अब तक घर में तो उनकी ही चलती है।

दिन को चूरमा बना कर वो हाथों से खिलाती है,
रात को सबको परियों की कहानियां सुनाती है।
पापा डांटे जब कभी तो पापा को ही डांटती है,
हां दादी के दम से ही तो मेरी मस्तियां कायम है।
और दिन-रात शरारतों की गाड़ी भी चलती है,
मेरी दादी अम्मा अब तो लाठी लेकर चलती है,
फिर भी अब तक  घर में उनकी ही चलती है।
=अर्चना गोयल माही, बहादुरगढ़ हरियाणा
 

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