दौलत = समरजीत

दौलत = समरजीत

<> बड़ी भागा दौड़ी है इस जहाँ मे,

हर कोई दौलत चाहता है,

अब तू ही बता ऐ खुदा, क्या ऐसा भी कोई है,

जो सिर्फ सुकून चाहता है।

<>सोचता हूँ कभी मैं भी दौलत के पीछे भागूँ,

पर दौलत वाला मंजिल नज़र नहीं आता है,

फिर कैसे जाऊं उन राहों पर,

जिस पर कोई मंज़िल नज़र नहीं आता है।

<> सुना हूँ , देखा हूँ , मैं भी,

तुझे हाँसिल करने से ऐ दौलत,

खुद में अहंकार हो जाता है।

जब तूँ पास आता है तो अपना  बिछड़ जाता है।

<>क्या अपने क्या पराए,

क्या लोग क्या समाज,

हर जगह बस तेरा बोल बाला हो जाता है।

<>हर लोग बस तुझे चाहते हैं,

तेरे आगे पीछे हर कोई,

अपनो को छोड़ कर भागता है।

<>तू गलती भी करे,

तो बड़े आराम से छुप जाता है।

<>तुझे रख कर आदमी, झूठी शान वो शौकत, दिखाता है,

पर वो खुद में झाँके तो, सबसे गरीब नज़र आता है।

<>ये तो दौलत वाला ही जानता है,

एक तुझे पास ले कर वो,

कितना अकेला हो जाता है।

<>ना अपना पास होता है, ना पराया पास होता है,

जो भी होता है, बस मतलब से होता है।

<>ना खुद के लिए वक़्त, ना औरों के लिए वक़्त होता है,

एक तुझे पाने की खातिर आदमी अपनों से दूर होता है।

<>फिर भी जाने क्यों,

हर कोई दौलत के पीछे भागता है।

<>जहां भी तूँ रहता है ऐ दौलत, वहां प्रेम की कमी हो जाता है,

बेगाने तो बेगाने, अपना भी बिछड़ जाता है।

<>वो खुल कर जिंदगी जीना दौलत वाला भूल जाता है,

हर जगह उसे असुरक्षा, असहनीय महसूस हो जाता है।

<>बड़े से बड़े घर में भी सुकून भूल जाता है,

एयरकंडीशनर कमरे में भी, नीन्द नहीं आता है।

<>और क्या क्या बात करूं, तेरी मैं ऐ दौलत,

एक तुझे हाँसिल कर आदमी सँस्कार तक भूल जाता है।

<>शहरों की चकाचौंध रौशनी उसे बुलाता है,

पर गाँव की वो प्यारी चाँदनी उसे नहीं भाता है।

>गजब का आदमी है, हर पल एयरकंडीशनर को अच्छा कहता है,

इसकी हवा को ठण्डी ठण्डी बताता है,

और सुबह सुबह शुद्ध हवा की खातिर,

सड़कों पर दौड़ लगाता है।

<>लग जाए मिट्टी जो तन पर, तो उसे झाड़ता पोछता है,

और मिट्टी की ही बनी जिस्म को, अनेको रँगों से सजाता है।

<>एक तुझे पाने की खातिर, जाने कितनों को तड़पाता है,

 फिर भी खाली रह जाती है तिजोरी, और पूरी उम्र वो कमाता है।

<>कितनो के तन पर ठेस, कितनों को मन पर ठेस पहुँचाता है,

तुझे पास लाने की खातिर अपना भी चैन- सुकून गंवाता है।

<>वाह रे दौलत तूँ भी इंसान को इंसान से,

जानवर बना जाता है।

<>इस दौलत की कीमत उतनी नहीं, जितना वो समझ जाता है,

ये बात उसे पता तब चलती है, जब उसका बुढापा आ जाता है।

<>तब तक बहुत देर हो जाती है,

क्योंकि ये बात जवानी में पता नहीं चल पाता है।

<>लड़कपन गुजरा, जवानी गुजरी, बुढापा गुजर जाता है,

मिटी ना कभी भूख वो, जो बचपन से पाला जाता है।

<>चैन गवाया, सुकून गवांया, रिश्ते बदले, नाते बदले,

सब कुछ लुटा कर दौलत कमाया जाता है।

<>उम्र की अंतिम घड़ी  में बड़ा पछतावा होता है,

काश कुछ अच्छे कर्म भी कर लिए होते ये बात जुबां पर आता है।

<>दौलत की तिजोरी ऐसी है,

सारी दुनिया की दौलत हाँसिल पर भी ये नहीं भर पाता है।

<>जितना भी कुछ हाँसिल कर लो,

कोई कुछ भी ले कर नहीं जाता है।

<>अरे मैंने भी सुना है समर सिकन्दर जैसा,

विष्व विजेता भी खाली हाँथ जाता है।

<>फिर भी जाने क्यों इन्सान हर वक़्त,

दौलत के पीछे भागता जाता  है।

= समरजीत मल्ल , रोवारी , कुशीनगर

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