दीपावली गीत - जसवीर सिंह हलधर 

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बाती मेरी तेल मिलाओ ,थोड़ा सा मुझको सुलगाओ ।
तम से जगत बचा लूँगा मैं ,सारे कष्ट उठा लूँगा मैं ।।

सूरज के आने तक पूरी ,रात निभाउंगा मैं वादा ।
लड़ते लड़ते अंधियारे से , बेसक रह जाऊं मैं आधा ।
चाहे पथ में आंधी आये ,चाहे मेघ नीर बरसाये ।
अपनी राह नहीं छोडूंगा , आगे कदम बढ़ा लूँगा मैं ।
तम से जगत बचा लूँगा मैं ,सारे कष्ट उठा लूँगा मैं ।।1

मेरे कुछ भाई सरहद पर ,प्रहरी बनकर खड़े हुए हैं ।
पत्थर की चट्टानों पर भी ,सीने उनके अड़े हुए हैं ।
घोर तिमिर को छलना है अब ,जलते जलते चलना है अब।
मसल मसल कर अपनी बाती ,पूरी रात जला लूँगा मैं ।
तम से जगत बचा लूँगा मैं ,सारे कष्ट उठा लूँगा मैं ।।2

मुझको दीपक राग सुनाओ ,मेरे भी मन को बहलाओ ।
मीठे मीठे गीत सुनाकर ,जग में भाई चारा लाओ ।
शब्दों छंदों की धाणी ले ,गायन में मधुरिम वाणी ले।
बैठ चिता की छाती पर भी ,गीत देश के गा लूँगा मैं ।
तम से जगत बचा लूँगा मैं ,सारे कष्ट उठा लूँगा मैं ।।3

चाहे कुछ भी हो जाये ,पर जलना नहीं छोड़ना मुझको ।
कितनी भी बाधा आयें ,पर चलना नहीं छोड़ना मुझको ।
घाटी में पाले आतंकी , संसद में करते नौटंकी ,
"हलधर" इन लोगो बचकर , रस्ता नेक निकालूँगा मैं ।।
तम से जगत बचा लूँगा मैं ,सारे कष्ट उठा लूँगा मैं ।।4
 - जसवीर सिंह हलधर, देहरादून
 

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