धत्त री प्रीत =अनुराधा पांडेय

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शाब्दिकी संवेदना से ,
जी हमारा भर गया है.....
साधना तो प्राणपन से ,
नित्य ही करते रहे हम ! 
एक रस निज देवता पर,
आयु भर मरते रहे हम । 
किन्तु निष्ठुर कह रहा था..
भाव ही अब मर गया है ।
शाब्दिकी संवेदना से ,
जी हमारा भर गया है ।
वेदना की ही विरासत ,
वो फलित में दे गया है ।
देह जड़ बस शेष है अब ,
किन्तु उर सँग ले गया है ।
नाम केवल उम्र भर की ,
पीर निष्ठुर ! कर गया है ।
शाब्दिकी संवेदना से,
जी हमारा भर गया है ।
=अनुराधा पांडेय , द्वारिका, दिल्ली

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