दोहा - अनिरुद्ध कुमार

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हरजाई के प्यार में, जीवन लगता शूल।
बैठी नैन पसार के, गया बलमुआ भूल।।

नैनों से आँसू बहे, घर लागे गमगीन।
आईना से क्या कहें, मन है आज मलीन।।

बिंदी माथे की कहे, नाहक तेरा पीर।
आयेगा सुन बालमा, रह थोड़ा गंभीर।।
                              
सुन पायलिया झूम के, दौड़ी कर झंकार।
कंगना खनक बोलती, चलो खोल दे द्वार।।

आशा को संबल मिला, मन में जागी प्रीत।
आनंदित तन मन हुआ, मुख से निकसे गीत।
- अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड
 

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