दोहा गजल = अनिरुद्ध कुमार

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सीधीसादी जिंदगी, सीधा रह इंसान,
टेढ़ीमेढ़ी क्यों चले, आफत से अंजान।

बेचैनी घेरे सदा, दु:ख दायक अंजाम,
बेतरतीब गुजर बसर, दिनरात परेशान।

उपर वाला देख रहा, हर मानव का काम,
करता है हिसाब वहीं, सुन भोले नादान।।

प्रकृति जीवन पर भारी, छेड़े है संग्राम।
मनु आज लाचार खड़ा, देख रहा हैरान।।

सहमा इंसा आज क्यों, अफरातफरी आम।
जैसी करनी फल चखे, गया कहाँ वो शान।।

नादानी सब छोड़ दे, रट मालिक का नाम।
यह संकट टल जायगा, होगा नया बिहान।।

जागो 'अनि' क्या सोंचते, मन हीं मंदिर धाम।
परहितकारी काम कर, हो सबका कल्यान।।
= अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड।
 

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