दोहा ग़ज़ल - अनिरुद्ध कुमार

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सावन में तरसें नयन, सजनवा नहीं संग,
विरह व्यथा झकझोर दे, पीर उठे हर अंग।१
 
हरियाली मनमोहनी, धरती भी खुशहाल,
मनवा हरत देख के, फूल खिलें हर रंग।२

तृप्त लगे है कुंज वन, चारों ओर धमाल,
मन तड़पे कासे कहूँ, यह जीवन बदरंग।३

अब व्यर्थ श्रृंगार लगे, आँसू ढ़ल के गाल,
कैसी रुत यह सावनी, देख छटा सब दंग।४

लट बिखराये आस में, सूरतिया बेहाल,
मदमाते भँवरे फिरे, जैसे कटी पतंग।५

रोम-रोम अवसाद में, का पर रहूँ निहाल,
सावन के झूले लगे, सखियों का हुड़दंग।६

बैरन बदरी दिलजली, यह जी का जंजाल,
फींका सावन'अनि' बिना, जीना लागे जंग।७
- अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड
 

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