डर = प्रीति आनंद

डर = प्रीति आनंद

किसी अपने को खोने के ख्याल से ही लगता है डर, 
बजे फोन की घंटी जब,लगे ना हो कोई बुरी खबर l

हर दिन, हर पल सभी है अब तो शायद आशंकित ,
किसी भी घर में सुख-शांति बची हो मात्र किंचित l

बेबस हताश लोग यहाँ चारों तरफ ग़म का है मंजर,
उथल-पुथल मची है हर दिल-दिमाग के भी अंदर I 

किसी की आंखें नम,किसी का सारा ऊजड़ा चमन,
दर्द से बोझिल साँसे,लूटे हुए ये तन-मन और धन l

कुछ की संवेदनाएँ हैं मरी, नहीं शायद ये भुक्तभोगी,
अवसरवादी बने बैठे कुछ लोग चाहे मरे कोई रोगी I
 
आदमी से ही आदमी को अब तो डर लगने लगा है,
कोई दोस्त यार ना कोई भी अपना संबंधी सगा है l
 
हर एक इंसा बस यहाँ रोगी या रोग का है वाहक ,
अपनों के पास जाने का भी रहा ना कोई वो हक़ I 

द्रवित, दुखी, विचलित ये मन है आज अति भारी ,
हे ईश्वर प्रार्थना है यही हमारी दूर करो ये महामारी l 
= प्रीति आनंद, इंदौर (मध्य प्रदेश)
 

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