टूटते रिश्तों का एहसास (लघु कथा) - ममता जोशी

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सोनू दफ्तर से घर आता है तो बहुत परेशान सा लग रहा है उसकी पत्नी ने तुरन्त ही पुछ लिया कि आप परेशान क्यो हो । सोनू के माथे पर चिंता की लकीरें दौड रही थी । सुधा ने एक बार फिर पूछा लेकिन सोनू अभी भी जबाब देने की हालत में नहीं था । फिर भी उसने हिम्मत करके बताने की कोशिश की ।
"तुम्हारे पापा का फोन आया था"
"सब ठीक तो है न"
सुधा ने पुछा,
"हाँ सब ठीक है बस वो कह रहे थे कि राज का उनसे झगड़ा हुआ है । और वो उनसे अलग रहना चाहता है "
राज का दिमाग खराब हो गया अभी-अभी तो शादी हुई माँ-बाप से अलग होने की बात कर रहा सुधा गुस्से में कहती हैं सोनू सुधा को समझते हुए कहता है कि हो सकता राज सही हो तुम्हारे माँ बाप गलत हो । इतना सुनते तो सुधा आग बबूला हो जाती । कहती है आपका दिमाग तो सही है । मेरे माँ-बाप कभी गलत नहीं हो सकते मै उन्हें बचपन से जानती हूँ।
सोनू कहता कि इसमें हम क्या कर सकते सुधा कहती हमे अभी मायके जाना है । फिर दोनो सुधा के मायके जाते सुधा पापा के कमरे में जा कर चिल्लाने लगी । पापा कहाँ है राज उसकी इतनी हिम्मत कि आप से अलग होने की बात कर रहा यह सुन कर पापा हैरान हो जाते और कहते हैं कि आप से किसने बोला । तब तक सभी आ जाते सोनू भी आ जाता सोनू सुधा से कहता मैंने झूठ बोला सुधा कहती पर क्यो?
सोनू कहता तूम गलत हो क्योकि मेरी माँ-बाप भी गलत नहीं हो सकते मै उन्हें बचपन से जानता हूँ ।
सुधा सब समझ जाती उसे एहसास हो जाता कि मै गलत हूँ । वह रोने लग जाती और कहती हैं कि मुझे माफ कर दो हम आज ही माँ-बाबु जी को घर लायेगे
हम जो खुशी अपने लिए चहाते वह दूसरे के लिए भी एहसास करना चाहिए । रिश्तों की एहमियत समझो सुखी रहोगे अपनी माँ-बाप से प्यार करते तो सास - ससूर से भी उतना ही प्यार करो वह  भी किसी के माँ-बाप है ।
= ममता जोशी,  प्रताप नगर, टिहरी गढ़वाल

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