यादो के झरोखो से = मोनिका जैन 

यादो के झरोखो से = मोनिका जैन

कुछ अल्फाजो को पंक्ति मे पिरो देती हूँ,
अंजाने मे अनकही बातो लिख देती हूँ। 
जब भी यादो के झरोखो से यादो की पुरवइया चलती है
कलम रुकती नही हर्फ दर हर्फ बन कर सफे पर उतरने लगती है
आजमाइश और पैमाइश को तौलते हुये
शिद्दत और मुदत की होङ करते हुये सब ब्यान हुये जाती है
अन कही बाते जो जेहन मे छ्प जाती है
दिल को तङपाती है लिख कर ही शान्त हो पाती है
कहना सुनना तो बेकार है अपना ही किरदार छोटा हो जाता है
कभी हाँ कभी ना के दायरे मे उसे झुलाया जाता है
काश ऐसा भी होता .....
जो कहना होता सामने वाला खुद ब खुद समझ जाता
सारी तोहमत का दौर वही खत्म हो जाता
अपने पराये न होते ,दिल टूटते नही , लोग आपस मे रूठते नही
अनकही ,कही हो जाती, ये दुनिया अपने आप बदल जाती
काश..बाते अनकही...समझ आ जाती.
= मोनिका जैन , दिल्ली

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