गीतिका (सार्द्धमनोरम छंद) - मधु शुक्ला

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चढ़ रही है नित नये सोपान कुर्सी,
बन गई संसार में भगवान कुर्सी।

दाँव पर सब कुछ लगाकर लोग चाहें,
प्रेम से अनभिज्ञ यह बेजान कुर्सी।

दौड़ कुर्सी के लिए नेता लगायें,
जिंदगी का आखिरी अरमान कुर्सी।

रोग भ्रष्टाचार का पलता यहाँ पर,
बेखबर इस बात से नादान कुर्सी।

पाप करतीं आदमी की कामनायें,
साथ में रह कर हुई शैतान कुर्सी।
✍️ मधु शुक्ला.  सतना. मध्यप्रदेश .
 

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