ग़ज़ल (तेवरी)  - जसवीर सिंह हलधर 

pic

साहित्य का हमने जिसे माना था सफ़ीना ।
राणा मुनव्वर देख लो कितना है कमीना ।।

माँ बाप पर कहता रहा ग़ज़लें बड़ी बड़ी ,
अफगानियों के खून को कहता है पसीना ।

वो तालिबानी सोच की करता है वक़ालत ,
वो सोचता है देश में काबिज हो मदीना ।

काशी अयोध्या देश की पहचान रहे हैं ,
वो जून को कहने लगा है सर्द महीना ।

जिस देश का खाता रहा लेता है लिफाफे ,
उस देश के मिष्ठान को माने न सबीना ।

ये मानसिक  बीमार है या रोग बुढापा ,
कहने लगा है लोह को भी धातु ज़रीना ।

सम्मान पूरे मुल्क ने कितना दिया इसे ,
हीरा कहे हिंदी ज़बां उर्दू भी नगीना ।

"हलधर" समूचे देश में दीमक लगी है ये ,
मैसूर या बंगाल या भोपाल ,  बबीना ।
- जसवीर सिंह हलधर, देहरादून  
 

Share this story