ग़ज़ल = अनिरुद्ध कुमार

ग़ज़ल = अनिरुद्ध कुमार

                (1)
आज देखो जिंदगी लाचार है,
दूर से सब कह रहें बीमार है। 
                (2)
रो रहा चिल्ला रहा हर आदमी,
वेदना में दर्द का चितकार है। 
                (3)
चेहरे को गौर से देखो जरा,
हर नजर में मौत का दीदार है। 
                 (4)
बोलते बेचैन कोरोना कहर,
टूटती सांसें कहे व्यापार है। 
                  (5)
जो बने फिरते मसीहा आज तक,
हर अदा उनकी यहाँ बेकार है। 
                   (6)
बंद कर बाजार बैठे चैन से,
पेट को भी सोंच कुछ दरकार है। 
                   (7)
मौत के डरसे सिमट बैठे कहाँ ? 
अनि बता कब तक लड़े धिक्कार है। 
= अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड।

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