ग़ज़ल = अनिरुद्ध कुमार 

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बीत गई जो बात गई अब क्या रोना
रतिया बीती याद गई अब क्या रोना
लाल किरणें नयी लहर कहे चल राही,
जागो देखो भोर हुई अब क्या रोना।
बाग बगीचे झूम रहे अब सोंचें क्या
कौन यहाँ पर है स्थाई अब क्या रोना
महल अटारी गिरते बनतें रीति यही
होते बीर धराशाई फिर क्या रोना।
जो आया उसको जाना पछताना क्या
इधर उधर किये बुराई अब क्या रोना
इस जीवन पर इतराना बलखाना क्या 
मालिक की दुनिया है भाई समझ जरा
अब ना सोंचो बढते जा वह देख रहा
'अनि' बोले आफत आई अब क्या रोना
= अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड

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