ग़ज़ल = अनिरुद्ध कुमार 

pic

रो रही है जिंदगी इन दिनों,
कौन पूछे आदमी इन दिनों।
               
राह कोई और दिखता नहीं,
मुश्किलों में हैं सभी इन दिनों।
                
दर्द में डूबा हुआ ख्वाब है, 
भूल बैठी रौशनी इन दिनों।
                
चाँद तारे कौन सोंचें बता,
गुफ्तगू होती नहीं इन दिनों।
              
मौत से सहमा डरा हर शख्स,
रूठ बैठी हमनशीं इन दिनों।
                  
इंतजारी बेकरारी कहे,
चल गुजारें पल कहीं इन दिनों।
                  
दो घड़ी 'अनि' चैन से काट ले,
बात भी लगती सही इन दिनों।
= अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड

Share this story