ग़ज़ल = अनिरुद्ध कुमार

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लग गई है किसी की नजर तो नहीं,
जिंदगी इस तरह बेकदर तो नहीं।
                     
बैठ सोंचे जहाँ को हुआ आज क्या,
लग रहा जल रहा ये शहर तो नहीं।
                      
आग सुलगा जमाना तमाशा करे,
लोग सहमें घरों में गदर तो नहीं।
                       
आदमी आदमी से कहे आज क्या,
जा रहे मुख छिपा बेखबर तो नहीं।
                        
हाल बेहाल लगता चले जा रहे,
कौन पूछे किसी का कहर तो नहीं।
                        
होश बेहोश लगता परेशान सा,
लोग सोंचे कहीं ये लहर तो नहीं। 
                          
आजकल लोग 'अनि' से नहीं बोलते
यह बुरे सोहबत का असर तो नहीं।
= अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड

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