ग़ज़ल - अनिरुद्ध कुमार 

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निगाहें नम अश्क ठहरे हुए है,
कहाँ जायें ज़ख्म गहरे हुए है। 

दिखाते प्यार के हंसीन सपने,
फसाना क्या कहें लहरे हुए है।

फजीहत रोज करता ये जमाना,
नकाब गजब सभी पहरे हुए है।

निगाहें हार जातीं कौन पूछे,
रुलाते हर घड़ी सिहरे हुए है।

रहें खामोश जालिम है जमाना,
मिलेगा आज कौन डरे हुए है।

पुकारे आज कैसे कौन अपना,
सुनेगा कौन सब बहरे हुए है।

यहाँ कैसे रहे 'अनि' रोज धोखा,
जुबानी जंग अब जहरे हुए है।

- अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद (झारखंड)
 

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