ग़ज़ल - अर्चना लाल 

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बुझी-बुझी सी' जिंदगी , चलो सँवार दो ज़रा ।
सभी दुखों को' भूल, बे'हिसाब प्यार दो ज़रा।

अगर तुम्हें हो' याद तो, करो वो' पल ही' याद तुम,
गुज़र गया जो' वक्त है,उसी का हार दो ज़रा।

मिला नहीं सुक़ून-ए-दिल, भटक रही है' ज़िन्दगी,
कभी कहे जो' इश्क़ में, वही करार दो ज़रा।

तलाश है मुझे मे'री , मुहब्बतों के' ख़ास पल,
हृदय की' वेदना सुनो,,ग़मों को' मार दो ज़रा।

पुकार लो अभी मुझे , न छोड़ यूँ ही' गर्त में,
बहुत रुला दिया हमें, अधर दुलार दो ज़रा।।
= 【अर्चना लाल , जमशेदपुर 】
 

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