ग़ज़ल = अशोक गुलशन 

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सूरज की ऐसी रुसवाई बदली में,
मेरे छत पर धूप न आई बदली में।

पैमाने टूटे मयखाने बहक गए,
तुमने जब-जब ली अंगड़ाई बदली में।

अंधियारे में रात-रात मुनिया रोयी,
मुझको भी तब नींद न आई बदली में।

बहुत दिनों के बाद कबूतर घर आया,
आज तुम्हारी चिट्ठी आई बदली में।

जब-जब दूर हुए तुम मेरी नज़रों से,
आँख -आँख भर याद नहाई बदली में।

तुमने कैसी नज़र लगा दी 'गुलशन' को,
कुछ भी देता नहीं दिखाई बदली में।
= डॉ. अशोक पाण्डेय ' गुलशन'
उत्तरी क़ानूनगोपुरा, बहराइच (उत्तर प्रदेश)
 

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