ग़ज़ल -- अशोक "गुलशन"

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आपने कह दिया कुछ हुआ ही नहीं,
हाल  ये  है  कि  कोई दवा ही नहीं।

आपको जबसे अपना समझने  लगा,
फ़िर कभी और कोई जँचा ही नहीं।

ग़ैर  अपने  लिये  हो  गया  मैं  मगर,
आप  भी  ग़ैर  हैं ये लगा  ही  नहीं।

आपको क्या पता प्यार में आज तक,
वश किसी का किसी पर चला ही नहीं।

आपको  देखकर  पूस  की  रात  में,
चाँद मुझको अभी तक दिखा ही नहीं।

जब कही तो कही आप पर ही ग़ज़ल,
आपके बाद फिर कुछ कहा ही नहीं।

आपने  दूर  जब से  किया  है  मुझे,
सर किसी गोद में फ़िर टिका ही नहीं।

आप   मेरे   रहें  आपका   मैं   रहूँ,
इस दुआ के सिवा कुछ दुआ ही नहीं।
-- अशोक "गुलशन", बहराइच (उत्तर प्रदेश)
 

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