ग़ज़ल = कर्नल प्रवीण त्रिपाठी

ग़ज़ल = कर्नल प्रवीण त्रिपाठी

नशा रंग का अब उतरता नहीं है।
नहीं और कुछ हम पे चढ़ता नहीं है।1

नशीला बहुत रंग है प्यार का ये।
सनम के बिना इश्क़ जमता नहीं है।2

करें बंदगी रोज उनकी हृदय से।
कहीं और मन अब ये' लगता नहीं है।3

सिवा आपके और चे'हरा न भाता।
दुआ के बिना प्यार फ़लता नहीं है।4

सहेजूँ न यदि हाथ से छूट जाये।
धड़कता मिरा दिल सँभलता नहीं है।5

पकड़ लो तनिक हाथ को प्यार से अब।
ये' , रूखा बहुत तो फिसलता नहीं है।6

द्रवित हो गया नेह पाकर अगर दिल।
बहे जो नयन नीर रुकता नहीं है।7
= कर्नल प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा / उन्नाव (उत्तर प्रदेश)
 

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