ग़ज़ल =  डॉ0 अशोक "गुलशन"

ग़ज़ल = डॉ0 अशोक "गुलशन"

जब से तेरा यार हुआ हूँ,
बिना पते का तार हुआ हूँ।

कभी नकद न हो पाया मैं,
हरदम यहाँ उधार हुआ हूँ।

रात-रात भर घटना होकर,
सुबह-सुबह अख़बार हुआ हूँ।

गम को काट सकूँ इस जग में,
ऐसी मैं इक धार हुआ हूँ।

सभी जगह ठुकराया जाता,
इतना सब पर भार हुआ हूँ।

प्यार में अपना सब कुछ खोकर ,
विरहिन का श्रृंगार हुआ हूँ।

तेरे खातिर मैं बिक जाऊं,
इसीलिये बाज़ार हुआ हूँ।

मत पूछो मैं कैसे-कैसे,
भवसागर से पार हुआ हूँ।

अपना इतना परिचय यारों,
'गुलशन' से अब खार हुआ हूँ।
= डॉ. अशोक 'गुलशन', उत्तरी क़ानूनगोपुरा
    बहराइच( उत्तर प्रदेश)
 

Share this story