ग़ज़ल ---डॉ० अशोक ''गुलशन''

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तुम्हारा इन्तजार है अब भी,
दिल मेरा बेकरार है अब भी।

हर कसम आज तक अधूरी है,
एक रिश्ता उधार है अब भी।

हाथ में हार, हार फूलों का,
और बजता सितार है अब भी।

तुम आओ कि सज गयी वेदी,
साथ डोली-कहार है अब भी।

मुझमें कुछ भी नहीं रहा बाकी,
फिर भी जां निसार है अब भी।

हो सके तो अभी चले आओ,
दिले-गुलशन बहार है अब भी।
--डॉ० अशोक ''गुलशन'', बहराइच उत्तर प्रदेश
 

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