ग़ज़ल -  डॉ. अशोक ''गुलशन' 

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बहुत दिन हो गए आँखों में वो मंज़र नहीं आते,
तुम्हारी याद के चेहरे हमारे घर नहीं आते।

हुआ है हाल ये अपना जो तुमसे दूर हो करके,
लिए अब हाथ में दुश्मन कभी खंज़र नहीं आते।

समय के साथ मिलकर काम करना बुद्धिमानी है,
हमेशा जिंदगी में एक से अवसर नहीं आते।

तुम्हारे प्यार के ख़त को लगा दी है नज़र किसने,
बहुत दिन से कबूतर अब हमारे घर नहीं आते।

भला कैसे करे अब बात कोई डूब जाने की ,
हमारी आँख में अश्कों के अब सागर नहीं आते।

बहुत है दूर मंजिल चल रहे हैं हम अकेले ही,
सदायें सुन के भी नजदीक अब रहबर नहीं आते।

हुए हमदर्द दुश्मन भी जुदाई में जरा देखो ,,,,
तुम्हारे बाद छत पर अब कभी पत्थर नहीं आते।

न जाने क्या खता कर दी है हमने प्यार में ''गुलशन'',
जिन्हें यह जिंदगी सौंपी वही दिलवर नहीं आते।
 - डॉ. अशोक ''गुलशन' 'उत्तरी कानूनगोपुरा, बहराइच (उ०प्र०)
 

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