गज़ल = डा० नीलिमा मिश्रा

गज़ल = डा० नीलिमा मिश्रा

समझते  बोझ हैं शायद नही अधिकार देते हैं

जाने लोग क्यों बेटी को अक्सर मार देते हैं।।

परीक्षण गर्भ में करवा रहे बेटे की चाहत में

विधाता क्रूर लोगों को नरक का द्वार देते है ।।

नपुंसक सोच उनकी जो  उठाते हाथ नारी पे

वो घर मंदिर सा लगता है जहाँ सत्कार देते हैं।।

होंगी बेटियाँ बहुँए कहाँ से ढूँढ पाओगे

उजाले की किरण बेटी उसे अँधियार देते हैं ।।

उन्हे कोई बताए कर रहे अन्याय क़ुदरत से

मसलते है गुलों को क्यों चमन को खार देते हैं ।।

करें नवरात्रि का पूजन तो कन्या ढूँढते फिरते

उसी हम शक्तिदात्री को बहुत प्रतिकार देते हैं ।।

हमें अब बेटियों का मान रखना नीलिमा पहले

पुरानी रूढ़ियों को तोड़ कर हम प्यार देते हैं।।

= डा० नीलिमा मिश्रा, प्रयागराज

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