गज़ल = डा० नीलिमा मिश्रा

गज़ल = डा० नीलिमा मिश्रा

ईद का चाँद मु्स्कुराया है ।
सारी दुनिया को जगमगाया है ।।

रोज़े रखते रहे दुआ माँगी ।
तब मसर्रत का दिन ये आया।।

दौरे-हाज़िर में इन चराग़ों ने।
ज़ुल्मते-शब को फिर हराया है।।

ईद का दिन है आ गले मिल लें ।
वक़्त ने तो बहुत सताया है ।।

इश्क़ में अब नही गिला कोई 
सारे शिकवों को भी भुलाया है ।।

हम सभी का है इक खुदा फिर भी ।
दरमियाँ फांसला क्यूँ आया है ।।

ढूँढ लो नीलिमा नई दुनिया ।
इस जहाँ मे तो सब पराया है।।
= डा० नीलिमा मिश्रा , प्रयागराज
 

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