ग़ज़ल = डा. रश्मि दुबे

ग़ज़ल = डा. रश्मि दुबे

जहां परिवार में हों सख़्तियां बंधन सा लगता है,
खुशी से मिल रहे हैं सारे तो अभिनंदन सा लगता है। 

महकने लगता है परिवार भी चारों दिशाओं में,
मुहब्बत से भरा हो दिल तो वो चंदन सा लगता है। 

जहां बेटी की किलकारी सुबह औ शाम गुंजित हो, 
भले टूटा फूटा हो घर मगर नंदन सा लगता है।

रहे दौलत थोड़ी सी कम मगर सम्मान दिल में हो, 
हमेशा आशियाना वो सही कुंदन सा लगता है।

कहां मिलते हैं ऐसे लोग औ बातें कहां ऐसी,
कहीं जो मिल भी जाये तो वो घर वंदन सा लगता है। 
= डा. रश्मि दुबे, गाजियाबाद
 

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