ग़ज़ल =  डॉ रश्मि दुबे

ग़ज़ल = डॉ रश्मि दुबे

बचपन के दिन भी होते थे कितने कमाल के, 
हर एक कदम रखते हैं अब हम संभाल के। 

हर फिक्र को धुएं सा उड़ाती रही थी मैं ,
करती हूं हर इक काम बहुत देखभाल के।

हर बात पर ही सोच समझ के चला करूं, 
किस्से न होने पाए कहीं भी बवाल के। 

रखती खुदा से वासता मैं बात बात पर,
देती नहीं कभी कोई मौके सवाल के। 

मन में अगरचे होता कभी भी भला बुरा, 
मौके संभाले रखती हूं मैं इन्फ़आल के। 
= डॉ रश्मि दुबे , गाजियाबाद
 

Share this story