ग़ज़ल = डॉ रश्मि दुबे

ग़ज़ल = डॉ रश्मि दुबे

जीस्त को अब उलझाने की ज़रूरत क्या थी,
तुम को घर छोड़कर आने की ज़रूरत क्या थी। 

रूखा सूखा मिलता था जितना भी तुमको, 
जो बचा था वो मिटाने की जरूरत क्या थी।  

रोज  ही  मौत  मुलाकात  किये  जाती  है, 
मौत से मिलने को जाने की ज़रूरत क्या थी।  

तू संभल सकता था कुछ दिन जो ठहर जाता तो,
तुझे दिल, रोज़ दिल जलाने की जरूरत क्या थी। 

जो खुदा पे था भरोसा तो समझ लेता तू ,
खुद से मरहम को लगाने की ज़रूरत क्या थी। 
= डॉ रश्मि दुबे , गाजियाबाद
 

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