ग़ज़ल  - किरण मिश्रा

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इश्क़  का  इम्तहान  बाकी है,
अभी तो जिस्म में जान बाकी है। 

लगा दी जिन्दगी की बाजी मैंने, 
साँसे फिर भी  तमाम बाकी है।

सींचती हूँ आँसुओं से निर्दय को, 
सुना पत्थर पे निशान बाकी है। 

खेला तितली समझ के रिश्तों को
उसके सपनों की उड़ान बाकी है।

 बुत को मैंने  खुदा  बना  डाला, 
#किरण उसमें तो इंसान बाकी है।
- किरण मिश्रा #स्वयंसिद्धा, नोएडा
 

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