ग़ज़ल =   माधुरी द्विवेदी "मधू"

ग़ज़ल = माधुरी द्विवेदी "मधू"

असलहों से मारता है आज-कल,
मुद्दई आबो-हवा है आज-कल !!

शक्ल से वाकिफ़ थे हम पहले मगर,
वक़्त का चेहरा नया है आज-कल !!

देख कर प्यारी ज़मीं की दुर्दशा,
आसमां भी रो रहा है आज-कल !!

किस तरह महके हमारी ज़िन्दगी,
आदमी मुर्झा गया है आज-कल !!

सब्र का हथियार रखना साथ में, 
रास्ता लड़ने लगा है आज-कल !!

दूर है बरसात का मौसम अभी,
ताज़गी मन चाहता है आज-कल !!

दिल ये रोता है  "मधू" हालात पे,
फिर भी खुशियाँ बाँटता है आज-कल !!
= माधुरी द्विवेदी "मधू", गोरखपुर, उत्तर प्रदेश
 

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